10/09/21

रावण...



यह कविता एक रावण नें सच्चाई सें जूडी हूँ वी है ।

रावण ..


हा रावण हूँ, मैं रावण हूँ ।
एक नारी के राग में
दुसरी नारी अपहरण
 किया है मैं ने ।
अपराध है ऐ पताता था ।
लेकीन बहन के सन्मान के लीये
झुक ना पडा मुझें ।
फिर भी उस नारी को सन्मान देकर
उचीत स्थान पे रखा था ।मैं ने
दस मुँह हो कर भी उस नारी सन्मान कीया मैं ने
एक ही मुँह हो कर तुम्हारा दस सें अधीक
नारी को गंधी नजर सें देख कर अपमान करते हो आपतों
एक बार नही हजार बार जला दो मुझें
राम राम जी का नाम लेते हो मुँख सें
पर उन गुणोका एक अंक्ष हे क्या आप मैं
रावण हूँ मैं  रावण हूँ मैं
कित नें गुणोका ज्ञान हे मुझ मैं भीर भी एक 
गलती के लीयें मृत्यू केली अपराधी हूँ मैं

रावण हूँ मैं रावण हूँ मैं....

                              शब्द कवी देवेंद्र...✍️

12 comments:

  1. खूपच छान रचना देवेंद्र सर 👌👌💐💐

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  2. अप्रतिम रचना सरजी 👍😊😊😊😊👌👌🍵

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  3. अतिशय सुंदर रचना केली सर ������✍️✍️

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  4. खूपच सुंदर अप्रतिम शब्द रचना आहे

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  5. अप्रतिम काव्य रचना केली दादा ✍️✍️💐💐

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  6. खरं बोललात...... अप्रतिम काव्य..👍👌✍️🍫

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  7. अप्रतिम 👌👌👌👌👌🙏🙏

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  8. अप्रतिमच 👌👌👌👌

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  9. वाहह... बेहतरीन प्रस्तुती....👌💐👍🍫

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  10. देवेद्रजी,आत्मबोध करणारी रचना!✍️👌👌👌

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  11. रावणाचे गुण छान वर्णन केले आहेस 🙏🏼🙏🏼

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